⦁ शाहाबाद का इतिहास
पटना के दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित चार जिले –आरा(भोजपुर), रोहतास, कैमूर और बक्सर पूर्व में शाहाबाद के नाम से जाने जाते थे I इनका कुल क्षेत्रफल 4,373 वर्ग मील, तथा 24°31´ से 25°46´ उत्तरी अक्षांश 83ᵒ10´ से 84ᵒ51´ देशांतर के मध्य स्थित है I इसके उत्तर में बलिया और गाजीपुर, पूरब में पटना और गया, दक्षिण में पलामू तथा पश्चिम में मिर्जापुर और गाजीपुर है I इसके उत्तर में गंगा और पूरब में सोन नदी बहती है, ये दोनों नदियाँ शाहाबाद के उत्तर-पूर्वी भाग में मिल जातीं हैं I दक्षिण दिशा में स्थित सोन नदी शाहाबाद और पलामू की सीमा है, उसी प्रकार से पश्चिम दिशा में कर्मनाशा नदी इसकी सीमा निर्धारित करती है I कर्मनाशा नदी चौसा में गंगा से मिल जाती है I ऐसा कहा जाता है कि सन 1529 में जब बाबर ने अफगानों पर विजय प्राप्त करके आरा में अपनी छावनी स्थापित किया तब उसने अपने आप को पूरे बिहार प्रान्त का शहंशाह घोषित किया और इस घटना के बाद से इस क्षेत्र को शाहाबाद कहा जाने लगा I
शाहाबाद को मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में विभक्त करके समझा जा सकता है I पहला क्षेत्र जिसे यहाँ की बोलचाल में ‘हेठार’ कहा जाता है, गंगा नदी और आरा बक्सर रेलवे लाइन के मध्य में स्थित भाग है I लगभग 550 वर्ग मील के क्षेत्र में फैले शाहाबाद के इस भाग के उत्तरी हिस्से में लगभग हर वर्ष बाढ़ आती है और बार-बार नदी के मार्ग बदलने के कारण कभी कटाव तो कभी उपजाऊ कछारी मिटटी के बड़े-बड़े भूखंड निकल आते हैं I इस इलाक़े में मुख्य रूप रबी फसलों जैसे कि गेहूँ, चना इत्यादि की अच्छी पैदावार होती है I हाल के वर्षों में इस भाग में खरीफ़ की पैदावार भी शुरू हुई है I
शाहाबाद के दूसरे और मध्य हिस्से का क्षेत्रफल 3000 वर्ग मील है I यहाँ की मिटटी बहुत ही उपजाऊ और इस पूरे क्षेत्र में सिंचाई के उत्तम साधन मौजूद रहे हैं I पूरब से पश्चिम चलने पर सिंचाई के साधन बढ़ते हुए दिखाई देते हैं I इस भाग में खरीफ़ और रबी, दोनों की अच्छी पैदावार होती है I इस हिस्से के पश्चिमी-दक्षिणी भाग में नहरों और नदियों की उपलब्धता किसानों के लिए वरदान है I इसके एक भाग को ‘धान का कटोरा’ भी कहा जाता है I आरा-बक्सर रेलवे लाइन से दक्षिण-पश्चिम का अधिकांश क्षेत्र नहर, नालों के विस्तृत सिंचाई संरचना से परिपूर्ण रहा है I
शाहाबाद का तीसरा भाग है कैमूर जिसका क्षेत्रफल 800 वर्ग मील का है I विन्ध्य पर्वत श्रृंखला का विस्तार लिए हुए शाहाबाद का ये भाग अन्य दोनों भागों से भिन्न है I ये पठारी क्षेत्र छोटे-बड़े पहाड़ों के विस्तृत समूह, जंगल, पथरीली और उबड़-खाबड़ भू-खंड, कई ऊँचे झरने, सोते और नदियाँ इस क्षेत्र की एक अलग प्राकृतिक छटा है I प्राचीन काल से शाहाबाद के इस क्षेत्र में दूर-दूर से लोग ताराचंडी मंदिर, मुंडेश्वरी मंदिर और गुप्ताधाम आते रहे हैं I ये तीनों ही धार्मिक स्थल प्राचीन आस्था केंद्र रहे हैं I यहाँ पूजा-पाठ एवं अन्य माँगलिक अनुष्ठानों के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं I हाल के वर्षों में यूटूब द्वारा यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य का भी खूब प्रचार हुआ है, यहाँ के वॉटरफॉल देखने आने वाले पर्यटकों की संख्या में काफ़ी अच्छी वृद्धि हुई है I
कहा जाता है कि सन 1744 में बंगाल के नवाब से युद्ध में हार जाने के बाद अफ़ग़ान शासक मुस्तफा खान के सिपाही कैमूर के जंगलों जाकर छिपे थे I उन्होंने यहाँ का वर्णन करते हुए बताया था कि –“असंख्य सापों और चीटियों के इस देश में रहना मानो ऐसा है जैसे कि जीवित मनुष्य को जला कर मार डालना” I इन सैनिकों ने रघुजी भोंसला से आग्रह किया था कि उन्हें इस जगह से निकलकर कहीं और रहने देने के एवज में वो अपनी पूरी जिंदगी महाराज के सेवा में लगा देने को तैयार थे I एक और प्रसंग के अनुसार अंग्रेज ऑफिसर जोसफ हुकर ने अपने खोज में पाया कि सन 1848 तक यहाँ के वन क्षेत्र के कई हिस्सों के बारे में दुनिया ज्यादा नहीं जानती थी I यहाँ के मूल निवासी कबीलाई थे और तरह-तरह के खतरनाक रीति रिवाजों को मानने वाले थे I पिछले सौ वर्षों में जंगलों को बहुत ज्यादा नष्ट किया गया है जिससे कि यहाँ के वनस्पति एवं वन्य जीवन को बहुत नुकसान हुआ है I सतत हो रहे प्राकृतिक क्षय के बावजूद भी यहाँ का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपने गौरवशाली अतीत की जीवंत छवि प्रस्तुत करता है I


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